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मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन The Witch 1



आज कुछ बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। जिसकी जरूरत मुझे कुछ पाठकों की प्रतिक्रियायें देखकर महसूस हुयी। और वो बातें ये हैं कि मेरे सभी उपन्यास और कहानी सामान्य विषयों पर नहीं हैं बल्कि उनके विषय और दृश्य ज्यादातर ‘जीवन के इस पर्दे से पार’ के हैं।
इसके अलावा दूसरी खास बात ये भी है कि आजकल लेखकों द्वारा जितना भी साहित्य आदि लेखन हो रहा है। उसमें सही मायनों में सही हिन्दी का इस्तेमाल ना के बराबर ही होता है, और इसके स्थान पर उर्दू या अंग्रेजी या फ़िर अन्य प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का इस्तेमाल ही अधिक होता है। जो कि मेरे लेखन में नहीं है, या फ़िर बेहद कम है।
तीसरी बात यह है कि मेरा उद्देश्य सिर्फ़ एक लेखक के तौर पर स्थापित होना भर नहीं है। बल्कि अपने पाठकों को तन्त्र मन्त्र, योग, पुनर्जन्म, परालौकिक आदि दुर्लभ विषयों पर अधिकाधिक जानकारी देना, तथा यदि उनमें चाह और योग्यता है, तो उन विषयों में रुचि जगाते हुये शोध की ओर उन्मुख करना भी है । क्योंकि संसार में तमाम लोग इस तरफ़ प्रयासरत हैं। पर शायद कहीं न कहीं उन्हें सही जानकारी का अभाव है।
यहाँ यह बात ठीक से समझ लेना चाहिये कि ऐसा लेखन सिर्फ़ मनोरंजन या दुनियावी जानकारी के उद्देश्य से नहीं होता, बल्कि उसका प्रभाव सीधा हमारी चेतना और अंतःकरण पर भी पङता है। जिसका सम्बन्ध न सिर्फ़ वर्तमान जीवन से है, बल्कि बीत चुके जन्मों, और आने वाले जन्मों से भी है।
अतः सामान्य तौर पर जब कोई पाठक पहली बार मेरी किसी किताब को पढ़ता है, तो उसे कभी कभी तो खास कोफ़्त सी महसूस होती है। उलझन और झुंझलाहट भी होती है। पर यहाँ वही बात है कि इसका कारण विषय और मेरी अजीब सी लेखनशैली ही है, और जो कि जानबूझ कर ही है।
अतः ऐसा भी नहीं है कि यह सब में सरल साधारण भाषा में नहीं लिख सकता। लिख सकता हूँ। पर ऐसा करने से फ़िर इसका उतना लाभ नहीं होगा। जिसकी होने की पूरी पूरी संभावना है।
इसलिये मेरा यही निवेदन है कि ये सभी उपन्यास आपको कुछेक उपन्यास पढ़ लेने पर ही ठीक ठीक समझ आयेंगे, और बहुत संभव है कि एक ही उपन्यास कुछ लोगों को दो या अधिक बार भी पढ़ना पङे।
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राजीव श्रेष्ठ
 आगरा


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डायन The Witch 2



तभी अचानक उसके मोबायल फ़ोन की घन्टी बजी ।
उसने रिसीव करते हुये कहा - यस ।
- सर ! दूसरी तरफ़ से आवाज आयी - हम लोग लाडू धर्मशाला के पास आ गये हैं । अब प्लीज आगे की लोकेशन बतायें ।
उसने बताया, और अपनी कीमती रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया ।
फ़िर वह बुदबुदाया - लाडू धर्मशाला.. इसका मतलब गड्डी से भी आधा घन्टा लगना था ।
और अभी शाम के चार बजने जा रहे थे ।
फ़िर वह लगभग टहलता हुआ सा मन्दिर की खिङकी के पास आया, और नीचे दूर दूर तक फ़ैले खेत, और उसके बाद घाटी और पहाङी को निहारने लगा । इस वक्त वह किशोरीपुर के वनखंड स्थित शिवालय में मौजूद था, और पिछले दो दिन से यहाँ था ।
वनखण्डी बाबा के नाम से प्रसिद्ध ये मन्दिर किशोरीपुर से बारह किमी दूर एकदम सुनसान स्थान पर था, और कुछ प्रमुख पर्वों पर ही लोग यहाँ पूजा आदि करने आते थे । जिन लोगों की मन्नत मान्यतायें इस मन्दिर से जुङी थी । वे भी गाहे बगाहे आ जाते थे ।
इस मन्दिर का पुजारी बदरी बाबा नाम का बासठ साल आयु का बाबा था । जो पिछले बीस सालों से इसी मन्दिर में रह रहा था । इसके अतिरिक्त चरस गांजे के शौकीन चरसी गंजेङी बाबा भी इस मन्दिर पर डेरा डाले रहते थे । और कभी कोई कभी कोई के आवागमन के क्रम में नागा, वैष्णव, नाथ, गिरी, अघोरी आदि विभिन्न मत के पन्द्रह बीस साधु हमेशा डेरा डाले ही रहते थे । विभिन्न वेशभू्षाओं में सजे इन खतरनाक बाबाओं को शाम के अंधेरे में चिलम पीता देखकर मजबूत से मजबूत जिगरवाला भी भय से कांप सकता था ।
पर बदरी बाबा एक मामले में बङा सख्त था ।
किसी भी मत का बाबा क्यों न आ जाय । वह मन्दिर के अन्दर बाहर शराब पीने और गोश्त खाने की इजाजत नहीं देता था । हाँ, गाँजे की चिलम और अफ़ीम का नशा करने की खुली छूट थी । क्योंकि खुद बदरी बाबा भी इन नशों का शौकीन था ।
इस समय भी मन्दिर पर बदरी और नीलेश के अलावा ग्यारह अन्य साधु मौजूद थे । जिनमें एक अघोरी और दो नागा भी आये हुये थे । नीलेश इन सबसे अलग मन्दिर के रिहायशी हिस्से की तिमंजिला छत पर मौजूद था । यह स्थान भी उसके गुप्त साधना स्थलों में से एक था, और बदरी प्रसून का तो भगवान के समान आदर करता था ।
- कहाँ होगा इसका अंत? नीलेश फ़िर से सोचने लगा - बङी विचित्र है, ये द्वैत की साधना भी । एक चीज में से हजार चीज निकलती हैं । जब भाई और गुरू ही खोज में हैं, तो वह तो बच्चा है । पुरुष और प्रकृति, और जीव और भगवान..द्वैत को लोगों ने अपनी अपनी तरह से बयान किया है फ़िर भी इसका रहस्य ज्यों का त्यों सा लगता है फ़िर आखिर इसकी जङ कहाँ है?
ऐसे ही विचारों के बीच उसने सिगरेट सुलगायी, और टहलता हुआ सा मंदिर वाले हिस्से की तरफ़ आया । बदरी बाबा चूल्हे पर चाय चढ़ा रहा था ।
तभी उसे दूर मंदिर की टेङी मेङी पगडंडीनुमा सङक पर एक बुलेरो आती दिखायी दी । नीचे बाबा लोग गोरखमत की किसी बात को लेकर झगङा करने के अन्दाज में बहस कर रहे थे ।
कुछ ही मिनटों में बुलेरो मंदिर के प्रांगण में आकर रुक गयी, और उससे चार लोग बाहर निकले । जिनमें दो अधेङ एक वृद्ध और एक युवा था । वे बदरी बाबा से कुछ पूछने लगे ।
तब बदरी बाबा ने मंदिर की सीढ़ियों की तरफ़ इशारा किया ।


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डायन The Witch 3


- ये पूरा मायाजाल । पीताम्बर आगे बोला - दरअसल, एक रहस्यमय बुढ़िया औरत को लेकर है । जो हमारी ही कालोनी में, मगर सभी मकानों से काफ़ी दूर हटकर, एक पुराने किलेनुमा बेहद बङे मकान में रहती है ।
यह सुनते ही नीलेश को न चाहते हुये भी हँसी आ ही गयी ।
पीताम्बर थोङा सकपका कर बोला - मैं आपके हँसने का मतलब समझ गया । मगर कभी कभी वास्तविकता बङी अटपटी होती है । दरअसल हमारी कालोनी जिस स्थान पर है । उससे दो फ़र्लांग  (पांच फ़र्लांग बराबर एक किमी) की दूरी पर, किसी जमाने में किसी छोटे मोटे राजा का किला था । करीब दो सौ साल पुराना वह किला, और किले के आसपास उसी समय के बहुत से जर्जर भवन अभी भी गुजरे वक्त की कहानी कह रहे हैं ।
बहुत से प्रापर्टी डीलरों ने इस भूमि को लेकर इसका नवीनीकरण करने की कोशिश की । पर विवादों में घिरी वह सभी भूमि जस की तस पुरानी स्थिति में ही है ।
दूसरे वह टूटी फ़ूटी हालत के भवन झाङ पोंछ देखरेख के उद्देश्य से किराये पर उठा दिये थे । जिसकी वजह से बहुत से किरायेदारों ने लगभग उस पर कब्जा ही कर रखा है । ऐसी हालत में वह एक किमी के क्षेत्रफ़ल में फ़ैला किला, और राजभवन से जुङे अन्य भवन, सभी खस्ता हालत में निम्न वर्ग के लोगों की बस्ती बन गये हैं, और जैसा कि मैंने कहा कि हमारी निम्न मध्यवर्गीय कालोनी सिर्फ़ उससे दो फ़र्लांग की दूरी पर है ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी, और बेहद शिष्टता से सिगरेट केस उन लोगों की तरफ़ बढ़ाया । हरीश को छोङकर उन तीनों ने भी सिगरेट सुलगा ली ।
- अब मैं वापस रहस्यमय बुढ़िया की बात पर आता हूँ । पीताम्बर एक गहरा कश लगाता हुआ बोला - आज से कोई बीस बाइस साल पहले की बात है, जब बुढ़िया के बारे में लोगों को पता चला कि..?
अचानक नीलेश चौंका, और तिमंजिला कमरे की खिङकी की तरफ़ देखने लगा ।
- ड डायन ! उसके बोलने से पहले ही नीलेश के मस्तिष्क में यह शब्द गूँजा ।
और उसके खुद के रोंगटे खङे हो गये ।
बङी मुश्किल से उसने खुद को खङा होने से रोका, और संभलकर आगंतुकों को देखने लगा ।
हँसती हुयी छायारूप एक खौफ़नाक बुढ़िया खिङकी पर बैठी थी ।
- मृत्युकन्या ! इस शब्द को उसने बहुत मुश्किल से मुँह से निकलने से रोका - साक्षात मृत्युकन्या की  बहुरूपा गण, यमलोक की डायन, खिङकी पर विराजमान थी, और बङे निश्चिन्त भाव से हँस रही थी । इतनी जबरदस्त शक्ति कि प्रेतवायु के जिक्र, यानी अपने बारे में बात होने, पर ही जान जाती थी । किसी आवेश की आवश्यकता नहीं, किसी मन्त्र संधान की आवश्यकता नहीं । और फ़िर भी वह कालोनी सलामत थी, यह जैसे कोई चमत्कार ही था ।
- कोई चमत्कार नहीं योगी ! डायन उससे सूक्ष्म सम्पर्की होकर बोली - मेरा मतलब, बस खास लोगों से होता है, जिनसे मैंने बदला लेना है, और जिनको यमलोक जाना है, बाकी से मेरा क्या वास्ता ।
- ओ गाड ! नीलेश माथा रगङता हुआ मन ही मन बोला - सच ही कह रही थी वह । पर ऐसी डायन से उसका आज तक वास्ता न पङा था । ये यहाँ से डायन होकर जाने वाली डायन नहीं थी, बल्कि वहाँ से डयूटी पर आयी डायन थी । एक सिद्ध डायन, एक अधिकार सम्पन्न डायन, एक नियम अनुसार आयी डायन ।
- किस सोच में डूब गये भाई ! पीताम्बर उसको गौर से देखता हुआ बोला - मैं आगे बात करूँ?
नीलेश का दिल हुआ, इन अज्ञानियों से कहे कि क्या बात करोगे, जब बात खुद ही मौजूद है । पर वह हाँ भी नहीं कर सकता था, ना भी नहीं कर सकता था । सच तो ये था कि उसकी खुद की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समय वो डायन को डील करे, या पीताम्बर कंपनी को ।
- हाँ तो मैं कह रहा था । पीताम्बर घङी पर निगाह डालता हुआ बोला - कि बीस बाइस साल पहले जब उस बुढ़िया ने अपने ही नाती को मार डाला, और उसका खून पी गयी । तभी हमें पता चला कि...!
- ड डायन !  पुनः नीलेश के दिमाग में गूंजने लगा ।
उसकी निगाह फ़िर से स्वतः खिङकी पर गयी ।
डायन पहले की तरह ही खौफ़नाक मगर मधुर अन्दाज में हँस रही थी ।


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डायन The Witch 4


- एक्सक्यूज मी ! नीलेश ने अचानक उसे बीच में टोका - बुढ़िया का लङका अब कहाँ है?
- वो इस समय डी एम है, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ।
नीलेश उछलते उछलते बचा ।
- भले ही आपको इस बात पर हैरानी हो रही होगी, पर वह और उसकी नयी बहू अब बुढ़िया से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, और किसी पहाङी जगह पर रहते हैं । सामंत साहब की पत्नी भी प्रशासनिक सेवा में है ।
- ओह ! हठात नीलेश के मुँह से निकला - तो उसकी पहली बहू को भी बुढ़िया ने मार डाला ।
- नहीं । पीताम्बर बोला - दरअसल, धीरज सामंत साहब की पहली शादी बुढ़िया ने छोटी उमर में ही कर दी थी । उस समय धीरज बाबू पढ़ रहे थे । उसी समय उनको एक पुत्र भी हुआ था । जिसे कि, जैसा कि मैंने बताया । बुढ़िया ने कुँएं के पत्थर पर पटक पटक कर मार डाला । इस घटना के बाद वह बहू पागल सी हो गयी, और यूँ ही इधर उधर घूमती रहती । वह बेहद गंदी हालत में रहती थी । फ़िर इसके बाद एक दिन वह शहर ही छोङकर कहीं चली गयी, और उसके बाद उसका कोई पता न लगा ।
बाद में धीरज साहब पढ़ाई के लिये बाहर चले गये, और उसी दौरान उन्होंने नौकरी लगते ही दूसरी शादी कर ली थी । वह उनकी लवमैरिज हुयी थी । इसके बाद धीरज साहब एक दो बार ही शहर में आये, और फ़िर कभी नहीं आये । इस तरह वह बुढ़िया काफ़ी समय से उस विशाल मकान में अकेली रहती है ।
नीलेश ने एक निगाह पूर्ववत ही खिङकी पर बैठी बुढ़िया पर डाली, और जानबूझ कर मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया - फ़िर बुढ़िया का खाना वाना कौन बनाता है, और उसका खर्चा वर्चा?
- आप भी कमाल करते हो, नीलेश जी ! पीताम्बर हैरानी से बोला - शेर की गुफ़ा में जाकर कोई बकरा उसके हालचाल जानेगा कि वह क्या कर रहा है, कौन मरने जायेगा ।
- जब बुढ़िया ने । नीलेश बोला - अपने अबोध नाती को मारा, तब आप लोगों ने पुलिस को इंफ़ार्म किया, या सोसायटी के लोगों ने कोई एक्शन लिया?
अब पीताम्बर और उन तीनों को साफ़ साफ़ समझ में आ गया कि यहाँ आकर उनसे भारी गलती हुयी । इस बन्दे के बस का कुछ भी नहीं है, और फ़ालतू में टीवी अखबार वालों की तरह इंटरव्यू कर रहा है । फ़िर भी एकदम अशिष्टता वे कैसे प्रदर्शित कर सकते थे ।
इसलिये वह बोला - नीलेश जी ! पुलिस वालों के बाल बच्चे नहीं होते क्या, जो वह अपनी और अपने घर वालों की जान जोखिम में डालेंगे । ये किसी क्रिमिनल का मामला नहीं बल्कि..!
- ड डायन ! एकदम उसके बोलने से पहले ही नीलेश के मस्तिष्क में एक शब्द ईको साउंड की तरह गूँजने लगा ।
- बल्कि..! नीलेश को उसकी आवाज फ़िर से सुनाई दी - एक डायन का मामला था । कोई उस क्षेत्र में फ़टकने भी नहीं जाता, वह डायन और डायनी महल पूरे शहर में प्रसिद्ध है ।
इस बार डायन मधुर स्वर में हँसी । उसके घुँघरू बजने जैसी ध्वनि सिर्फ़ नीलेश को सुनाई दी । लेकिन उसने खिङकी की तरफ़ देखने की कोई कोशिश नहीं की ।
- खैर..! नीलेश फ़िर से बोला - उस बुढ़िया से आपको क्या कष्ट? वह तो आपसे दो फ़र्लांग दूर रहती है, और फ़िर आपने कहा कि उसकी बस्ती में बहुत से अन्य लोग भी रहते हैं ।
पीताम्बर का मन हुआ कि अपने बाल नोच ले । भेजने वाले ने क्या सोचकर इसके पास भेजा ।
- आप कष्ट पूछ रहे हो । पीताम्बर बोला - ये पूछिये, क्या कष्ट नहीं है । हम लोग बेहद सतर्कता से रहते हैं । डायन ने कितने ही घर वीरान कर दिये, कितने ही लोगों को खा गयी, यानी मार डाला । वो बहुत दूर से खङी भी किसी को देखे, तो बदन में जलन होने लगती है । कभी किसी के घर के आगे रोटी का टुकङा फ़ेंक जाती है, किसी के घर के आगे हड्डियाँ फ़ेंक जाती है । किसी के दरवाजे पर खङी होकर रोटी प्याज भी माँगती है ।
- ओह.. ! नीलेश सीरियस होकर बोला - फ़िर तो यह वही मालूम होती है, जिसकी मीडिया में भी काफ़ी चर्चा हुयी थी । फ़िर शायद वह आपके ही शहर में रहती है । खैर..जब वह आपके यहाँ से रोटी प्याज माँगती है, तब आप उसको देते हो ।
- हमारा बाप भी देगा । पीताम्बर झुंझलाकर बोला - देना पङता है, अपने घर को किसी आपत्ति से बचाने के लिये, बिन बुलायी मुसीबत से बचाने के लिये ।
- अंधेरा..कायम रहेगा ! डायन उसे अँगूठा दिखाती हुयी बोली ।


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डायन The Witch 5


- ! फ़िर अचानक वह खिसियाया सा बोला - क्या बिगाङा है, इन मासूम लोगों ने तेरा । क्यों नहीं इन्हें चैन से जीने देती, इन हत्याओं से तुझे क्या मिलता है ।
- सावधान योगी ! डायन यकायक धीर गम्भीर स्वर में बोली - मैं कोई ऐ..बे..तू..दुष्ट..श्रेणी की छिछोरी महत्वहीन प्रेतात्मा नहीं हूँ । मैं गण श्रेणी में आने वाली नियुक्त डायन हूँ, और मृत्युकन्या के अधीन कार्य करती हूँ ।
यह सब जानते हुये भी नीलेश को उसके बोलने पर ऐसा लगा, मानो उसके पास बम फ़टा हो । वह अपनी जगह पर जैसे जङवत होकर रह गया, और उसके कानों में अज्ञात अदृश्य शून्य की सांय सांय सी गूँजने लगी ।
मृत्युकन्या !
मृत्युकन्या कोई मामूली बात नहीं थी ।
और इसका एकदम साफ़ सा मतलब था कि वह डयूटी पर आयी थी, और उसे उसका कार्य करने से कोई नहीं रोक सकता था । शायद इसीलिये ये अच्छा ही हुआ था कि पीताम्बर और दूसरों ने उसे खुद ही नाकाबिल समझ लिया था, वरना ये भयावह स्थिति वह उन्हें एक जन्म में भी नहीं समझा पाता । और अगर समझाने में कामयाब भी हो जाता, तो वह उन्हें कोई दवा देने के स्थान पर उनका दर्द और भी बढ़ाने वाला था । क्योंकि इससे तो वे और भी भयभीत ही हो जाने वाले थे ।
- शक्ति ! यकायक फ़िर जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया ।
डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा, कायम रहेगा ।
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नीलेश कमरे से बाहर आकर नीचे मंदिर के प्रांगण में झांककर देखने लगा कि पीताम्बर एण्ड कंपनी क्या कर रही है । उसकी आशा के मुताबिक ही वे नीचे अन्य साधुओं से बात कर रहे थे ।
वह फ़िर से कमरे में आ गया ।
- आप फ़्रिक मत करिये ! उसे डायन का मधुर स्वर सुनाई दिया - उन्हें आज मंदिर में ही रुकना होगा, और उनमें से एक को..। उसने आसमान की तरफ़ उँगली उठायी - आज रवाना होना पङेगा । क्या अजीब सा खेल है ना, कि मृत्यु की गोद में बैठे इंसान को भी पता नहीं होता कि बस वह कुछ ही घंटों का मेहमान और है । यही नियम है, यही दस्तूर है ।
वह जो भी बोलती थी । उससे आगे बोलने के लिये जैसे नीलेश के पास शब्द ही नहीं होते थे । फ़िर वह क्या बोलता, और क्या करता । अतः वह खुद को एकदम असहाय सा महसूस कर रहा था । उसे गुरू की जरूरत महसूस हो रही थी, उसे प्रसून की जरूरत महसूस हो रही थी । पर क्या पता वे कहाँ थे ।
फ़िर भी वह बोला - लेकिन इसका क्या प्रमाण कि जो आप कह रही हो, वह सच है । मतलब आप मृत्युकन्या द्वारा नियुक्त हो ।
- प्रत्यक्षम किं प्रमाणम । वह किसी देवी की तरह ही बोली - योगी, आज रात का खेल जब देखोगे, तब यह प्रश्न खुद समाप्त हो जायेगा । मेरे द्वारा शरीर मुक्त की गयी जीवात्मा को लेने जब दूत आयेंगे, तो वे मुझे प्रणाम करेंगे, और त्रिनेत्रा योगी के लिये ये दृश्य देखना कोई बङी बात नहीं । 
नीलेश का सर मानो धङ से अलग होकर अनन्त आकाश में तेजी से घूमने लगा ।
और वह सिर रहित धङ ही रह गया ।


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डायन The Witch 7




- मैं सुन्दरी नहीं हूँ । वह बिना किसी भाव के बोली - मेरा नाम चंडूलिका साक्षी है, और यमलोक मेरा निवास है, क्या तुम मेरा मेहमान बनना पसन्द करोगे?
- कमीनी ! न चाहते हुये भी स्वभाववश नीलेश के मन में भाव आ ही गया - तेरा मेहमान बनना, तो शायद मूर्ख से मूर्ख भी ना पसन्द करे ।
- लेकिन ऐसा नहीं है । अबकी बार डायन बिना किसी उत्तेजना के शान्त स्वर में बोली - योगी आप डायन या ऐसी अन्य गण आत्माओं के बारे में जानते नहीं हैं, इसलिये ।
- जानना भी नहीं चाहता । इस बार नीलेश के मुँह से निकल ही गया - मेरे दिमाग में इस समय सिर्फ़ एक ही बात है कि हरीश की मौत होगी, मगर क्यों, क्यों चंडूलिका साक्षी क्यों, आखिर क्यों? जबकि तुम इसे अलफ़ बता रही हो ।
- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । वह डाली पर ठीक से बैठती हुयी बोली तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि, क्योंकि हे योगी ! जिसने जन्म लिया है, उसका मरना निश्चित है, और उसके बाद मरने वाले का जन्म भी तय है । जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता, कुछ भी नहीं किया जा सकता । फ़िर ऐसा जानकर उसके बारे में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।
मगर न जाने क्यों, न जाने कौन सी अज्ञात प्रेरणा से नीलेश अब उस डायन से प्रभावित नहीं हो रहा था, और अपने स्वभाव में लौट आया था । अब वह नीलेश था, वास्तविक नीलेश ।
अतः एकदम लापरवाह होकर बोला - तेरी माँ ..
तभी उसे पीताम्बर ऊपर आता दिखायी दिया ।
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- हम लोग आज रुक गये । वह बेहद गर्मजोशी से बोला - दरअसल भगवान की कृपा से हमारा काम बन गया । नीचे बाबाओं में जो गजानन बाबा हैं, उन्होंने कहा है कि डायन क्या उसकी माताजी भी हमारी बस्ती छोङ देगी, उन्होंने बहुत टेङी टेङी डायनों चुङैलों को ठीक किया है । वे आपके बारे में कह रहे थे कि आप अभी नौसिखिया हैं । ..नीलेश जी माइंड मत करना, लेकिन ये डायन चुङैल वास्तव में बच्चों के काम नहीं हैं । फ़िर अभी आप तंत्र विद्या सीख रहे हो, और अभी उमर ही क्या हुयी होगी आपकी । अभी तो शायद, शादी भी नहीं हुयी होगी । वैसे आप शादी तो करेंगे ना । बुरा मत मानना, क्योंकि मैंने सुना है कि साधु लोग अक्सर शादी नहीं करते, ना । लेकिन हम ग्रहस्थ लोगों का तो शादी बिना गुजारा नहीं हो सकता । 
- कमाल है । नीलेश मन ही मन हैरान सा रह गया - इसे अचानक क्या हो गया ।
तब उसे ख्याल आया कि ये गांजा भरी चिलम का कमाल था, जो उसने थोङी देर पहले नीचे साधुओं के साथ पी थी, और उसे पीने से काफ़ी हद तक उसके मन से डायन का खौफ़ जाता रहा था ।
परन्तु मौत का बिगुल बज चुका था । मौत और मरने वाला आमने सामने आ चुके थे, लेकिन उस भावी मौत से अनजान ये इंसान कितना खुश था । सिर्फ़ कुछ घन्टे बाद होने वाली मौत से ।
नीलेश उससे हरीश के बारे में पूछना चाहता था । पर उसमें एक बेहद दिक्कत वाली बात यह थी कि हरीश वाकई मर जाता, या अन्य कोई बङा हादसा होता, तो उसके तार खामखाह उससे जुङ जाने वाले थे । क्या पता हरीश के साथ क्या और कैसे होने वाला था, और इस तरह पूछकर एक होने वाली बात से जानबूझ कर सम्बन्ध बनाता हुआ, वह एक और नयी मुसीबत को जन्म नहीं देना चाहता था ।
लेकिन तभी उसे डायन की आवाज सुनायी दी - चिंता न करो, और मौत का नंगा नाच देखो । जो आप जानना चाहते हो । वह यह खुद बतायेगा, और बिना पूछे बतायेगा ।
- अब देखो ना । पीताम्बर सिगरेट का गहरा कश लेता हुआ बोला - मेरे लङके हरीश को ही देखो । अभी क्या उमर है उसकी, पर मैंने उसकी शादी तय कर दी । नीलेश जी, बुरा मत मानिये, लेकिन आजकल इंडिया में विदेशों की तर्ज पर फ़्री सेक्स का चलन होता जा रहा है । ऐसे में कुछ उल्टा सुल्टा हो जाये, तो कुल खानदान पर दाग लग जाता है । इसलिये मैं उसकी जल्द से जल्द शादी कर देना चाहता हूँ ।
- मगर मौत से । चंडूलिका सर्द स्वर में बोली - वो भी कुछ ही देर में, अर्थी रूपी घोङे पर बैठा हुआ, रक्त से सराबोर सजा हुआ, और तुम्हारे रुदन की मातम रूपी शहनाईयाँ सुनता हुआ, वह अपनी बारात शमशान ले जायेगा, और मौत की देवी का आलिंगन करेगा, जो बेकरारी से उसका इंतजार कर रही है । 
उस बेहद सर्द स्वर को सुनकर नीलेश जैसे इंसान के भी भय से रोंगटे खङे हो गये ।


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मेरे बारे में

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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।