शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

पिशाच का बदला 3



नन्दू लगभग पांच साल पहले मरा था ।
और पुनर्जन्म हुये बालक डब्बू के रूप में अभी ढाई साल का था ।
पांच महीने लगभग उसने गर्भ में बिताये । क्योंकि गर्भ में बढ़ते पिंड में जीव चार या सात महीने पूरा होने पर प्रवेश करता है । इसका मतलब लगभग दो साल तक वह प्रेत बनकर भटकता रहा ।
और फ़िर वर्माजी की चौथे नम्बर की पुत्रवधू पुष्पा जब गर्भवती हुयी, तो नियमानुसार ही वह अपना कर्ज वसूलने उनके घर ही आ गया ।
क्योंकि नन्दू अकाल मौत मरा था, निर्दोष मरा था ।
इसलिये प्रेतयोनि के तमाम कष्टों से उसे ज्यादा नहीं जूझना पङा ।
लेकिन इस बात से प्रसून के दिमाग में एक नया रहस्य मानसी विला से ही पैदा हो गया था ।
नन्दू उर्फ़ पुनर्जन्म हुआ बालक डब्बू अब प्रेत नहीं था । लेकिन उसके दिमाग का वह हिस्सा तीन, यानी एक छोटा और दो बङे प्रेतों की पुष्टि कर रहा था, और दिमाग के उस अध्याय का शीर्षक बदला था । तो फ़िर ये तीन प्रेत कौन थे, जो डब्बू को माध्यम बनाकर निर्दोष रेशमा को परेशान कर रहे थे?
ये सभी बातें वह बिना किसी ओझाई आडम्बर के यानी किसी माध्यम को बैठाना और प्रेत आहवान यानी ‘ह्यीं क्लीं चामुन्डाय विच्चे’ आदि के बिना भी जान सकता था । और समस्या को बिना किसी नाटक के भी हल कर सकता था । पर यहाँ मामला दूसरा था । और उसकी नैतिकता के अनुसार उसका प्रयास ये था कि न सिर्फ़ वह वर्मा परिवार को प्रेतपीङा से मुक्ति दिलाये । बल्कि नन्दू के परिवार धनदेवी और लक्ष्मी को भी यथासंभव न्याय दिलाये । इसलिये इस क्रिया को अब वह पूरी तरह से खुलकर करना चाहता था ।
इसीलिये प्रसून ने रामवीर को अकेले मन्दिर ले जाकर न सिर्फ़ सारी बातें कबूलवाईं । बल्कि उसे आगे की कार्यवाही हेतु एक गवाह के तौर पर भी तैयार किया ।

रात के साढ़े दस बज चुके थे ।
वर्मा परिवार के साथ साथ प्रसून भी डिनर से फ़ारिग हो चुका था ।
उसने वर्माजी को पहले ही समझा दिया था कि इस प्रेत आपरेशन की बिलकुल पब्लिसिटी न होने पाये । जैसा कि आम ओझागीरी के समय तमाम गांव के लोग इकठ्ठा हो जाते हैं, और देर तक फ़ालतू की हू हा होती है । और इसी का परिणाम था कि गांव का या बाहर का कोई आदमी तो दूर स्वयं वर्माजी के परिवार के अधिकांश लोग इस समय छत पर नहीं थे ।
बल्कि इस समय रेशमा, वर्माजी, रामवीर, वर्माजी की पत्नी हरप्यारी देवी, पुष्पा, और पुष्पा का पति धर्म सिंह और सोता हुआ डब्बू ही उसके साथ छत पर मौजूद थे, और आगामी दृश्यों की धङकते दिल से प्रतीक्षा कर रहे थे ।
प्रसून ने एक सिगरेट सुलगायी, और कश लगाता हुआ छत की जालीदार बाउंड्री के पास आकर खङा हो गया । उसके साथ सिर्फ़ वर्माजी थे । बाकी लोग पीछे चारपाईयों पर बैठे थे ।
प्रसून ने वर्माजी की ओर देखा, और मुस्करा कर बोला - हाँ कहूँ तो है नहीं, ना कही ना जाय । हाँ ना के बीच में साहिब रहो समाय । वर्माजी आप इस बात का मतलब जानते हैं? वैसे तो ये भगवान की स्थिति और आदमी की जिज्ञासा की बात है ।
लेकिन इस वक्त ये सन्तवाणी कुछ अलग अर्थ में आपके ऊपर फ़िट हो रही है । आपका नाम साहिब सिंह वर्मा है, और इस वक्त प्रेत से प्रभावित आपके घर के लोग छत पर बैठे हैं । लेकिन प्रेत कहीं नजर आ रहा है? और प्रेत यहाँ बिलकुल नहीं है । ऐसा कम से कम आप तो नहीं कह सकते । भूत प्रेत होते ही नहीं हैं । अब कम से कम भुक्तभोगी हो जाने के बाद आप ये बात नहीं कह सकते । लेकिन मैं आपसे प्रश्न करता हूँ कि प्रेत यदि हैं, तो वो कहाँ है?
वर्माजी ने असमंजस की स्थिति में उसकी तरफ़ देखा ।
अपने परिवार की तरफ़ देखा, और फ़िर असहाय भाव से इंकार में सिर हिलाने लगे ।
प्रसून ने बहुत हल्के उजाले में लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित गांव के मन्दिर और वर्माजी की हवेली के ठीक बीच में खङे पीपल के पुराने और भारी वृक्ष की तरफ़ देखा 
और उंगली से उसकी तरफ़ इशारा करते हुये कहा - वहाँ, वहाँ हैं, वो प्रेत ।
और फ़िर उसी उंगली को, उसी अन्दाज में घुमाते हुये, वह अपनी जगह पर घङी के कांटे के अन्दाज में घूमा, और उंगली को रेशमा की तरफ़ कर दिया ।
यकायक ही रेशमा का शरीर अकङने लगा, और उसकी मुखाकृति विकृत होने लगी । इसी के साथ सोता हुआ डब्बू किसी चाबी लगे खिलौने की तरह उठकर बैठ गया । परिवार के अन्य लोग भी स्वाभाविक ही सतर्क हो गये ।


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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।