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मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन The Witch 6




शाम के सात बजने वाले थे ।
और हल्का हल्का अंधेरा घिरने लगा था ।
तभी उसकी निगाह मंदिर के आंगन में ही खङे पीपल के विशाल वृक्ष पर गयी ।
जिस पर बैठी पैर झुलाती हुयी डायन नीचे बैठे लोगों को ही देख रही थी ।
- सान्ता मारिया ! वह सीने पर क्रास बनाकर बोला - किसका सफ़ाया करने वाली है यह? कौन जानता था ।
उसके दिमाग में कुछ देर पूर्व ही हुआ सारा वाकया किसी रील की तरह घूमने लगा ।
खासतौर पर गुरू का ये कहना सर्वत्र..
इसका तो मतलब यही हुआ ना कि प्रसून भाई उसके साथ हैं ।
लेकिन कहाँ? इस बात का कोई उत्तर उसके पास नहीं था ।
पीताम्बर और उसके साथी वाकई रुक गये मालूम होते थे । पर वे क्यों कर रुके थे, ये अभी उसको पता नहीं था । बदरी बाबा और दो अन्य साधु मिलकर भोजन बनाने की तैयारी कर रहे थे ।
जो होगा देखा जायेगा, सोचकर उसने एक सिगरेट सुलगायी, और गहरा कश लेते हुये पीपल पर झूलती हुयी सी डायन को देखने लगा ।
फ़िर अचानक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी।
और उसने समूची एकाग्रता डायन पर केन्द्रित कर दी ।
आज रात में डायन उन चार आगंतुकों में से किसी एक को यमलोक पहुँचाने वाली थी । इसलिये बहुत संभव था कि डायन का पूरा ध्यान उसी लक्ष्य व्यक्ति पर केन्द्रित रहेगा, और तब इसकी सबसे बङी पहचान ये होगी कि उन चारो में से मौत की गोद में बैठ चुके व्यक्ति के मस्तक आदि पर मृत्यु के लक्षण जैसे जाला सा बनना, उसके दोनों सुरों का एक साथ चलना, उसकी चाल ढाल व्यवहार में एक सम्मोहन सा होना अवश्य होंगे । इससे बहुत आसानी से पता लग सकता था कि आज कौन हलाल होने वाला है, और तब शायद कुछ किया भी जा सकता है ।
मगर शायद ही !
पर इस परीक्षण में भी कठिनाई थी । एक तो अंधेरा हो चुका था, इसलिये शरीर पर उभरे मृत्यु पूर्वाभास चिह्न देखना आसान नहीं था । वे चारो अथवा नीचे वाले मिलाकर कई लोग हमेशा साथ ही रहने थे । अतः सम्मोहित को भी आसानी से तलाशना मामूली बात नहीं थी । दूसरे अगर डायन रात के दो बजे तक भी टारगेट को निशाना बनाने वाली थी, तो अब से लेकर सिर्फ़ सात घण्टे ही बचे थे ।
सिर्फ़ सात घन्टे !
और इन सात घन्टों में कोई भी समय ऐसा नहीं आने वाला था, जब वह कुछ कर सकता था ।
कुछ, मगर क्या?
कुछ भी, जो अभी खुद उसे ही पता नहीं था ।
फ़िर उसने वही अंधेरे में तीर चलाने का नुस्खा आजमाने की सोची, और डायन की दृष्टि का अनुसरण करने की कोशिश करने लगा । मगर नीचे पीताम्बर कंपनी को मिलाकर एक दर्जन से अधिक लोग लगभग एक साथ ही बैठे हुये थे, और ऐसे में वह डायन खास किसको ध्यान में ले रही है । पता करना बेहद कठिन ही था ।
तभी अचानक डायन वहीं बैठी बैठी उससे खुद ही सम्पर्की होकर बोली - अँधेरा..कायम रहेगा । आप मेरी गतिविधियों को अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं, चलो मैं खुद ही बता देती हूँ कि मेरा लक्ष्य हरीश है, सबसे छोटा हरीश ।
नीलेश के दिमाग पर मानों घन प्रहार हुआ हो । फ़िर स्वतः ही उसने नीचे देखना बन्द कर दिया, और कुर्सी की पीठ पर टेक लगाता हुआ अधलेटा सा होकर अब निश्चिन्त भाव से डायन की तरफ़ देखने लगा ।


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डायन The Witch 8



ठीक दो घन्टे बाद ।
जैसे ही घङी ने रात के ग्यारह बजाये, हरीश को कुछ बैचेनी सी महसूस हुयी ।
ये बैचेनी क्यों थी, इसका उसे कुछ पता नहीं था । उसे लघुशंका की भी आवश्यकता महसूस हो रही थी । उसने अपने पास सोये लोगों पर निगाह डाली, और तख्त से उठ खङा हुआ । फ़िर वह लघुशंका हेतु मंदिर के पिछवाङे पहुँचा ।
तभी उसे मंदिर से कुछ ही फ़ासले पर स्थिति छोटी पहाङियों के नजदीक, जुगनू की तरह चमकती, मगर उससे अधिक प्रकाश वाली, चार आँखें सी चमकती नजर आयीं । जो किन्हीं जंगली जीवों जैसी प्रतीत होती थी । हरीश ने इससे पहले ऐसी अदभुत चीज कभी नहीं देखी थी, वह बेख्याली में सम्मोहित सा उधर ही जाने लगा, जैसे किसी अदृश्य डोर से बंधा हो ।
यह मौत का बुलावा था, अंतिम आमंत्रण ।
उसे नहीं पता था कि गजानन बाबा चुपचाप उसके पीछे दूरी बनाकर चल रहा था ।
बाहर हल्की हल्की सर्दी सी थी । यूँ भी खुले में गर्मियों में भी ठंड मालूम होती है । नीलेश ने अपने बदन पर जैकेट डाल ली, और उसकी जेबों में हाथ डाले हुये वह पहाङियों की तरफ़ जाने लगा । डायन कहाँ हैं, क्या कर रही है? अब इससे उसे कोई मतलब नहीं था ।
दरअसल उसने आज रात जागते ही गुजारने का तय कर लिया था, और वह इन आगंतुकों पर बराबर नजर रखे हुये था । उसे अच्छी तरह मालूम था कि डायन का कहा मिथ्या नहीं था, और वह इस मौत का लाइव टेलीकास्ट देखना चाहता था, जो बकौल चंडूलिका साक्षी अलफ़ थी, और टल भी सकती थी । हालांकि डायन ने अपने सभी पत्ते नहीं खोले थे, पर वह बेचारी नहीं जानती थी कि नीलेश महान योगियों के शक्तिपुंज से एक चेन द्वारा जुङा हुआ है, और बहुत कुछ जान गया है ।
जैसे ही हरीश उन जानवरों के समीप पहुँचा । उनका कुछ कुछ आकार उसे समझ आने लगा ।
वे चीते के बच्चे समान कोई जानवर थे, और आपस में लङते हुये से मालूम हो रहे थे । उससे कुछ ही अलग चलते हुये गजानन बाबा ने किसी अदृश्य प्रेरणा से हाथ में पत्थर का टुकङा उठा लिया था, और उन जंगली जानवरों को लक्ष्य कर मारने वाला था । उसका इरादा हरीश को बचाने का था ।
चंडूलिका साक्षी इस डैथ ग्राउंड से कुछ ही अलग एकदम शान्त खङी थी । पर उसकी आँखों में एक प्यासी खूनी चमक तैर रही थी । चार भयंकर यमदूत पहाङियों पर आ चुके थे, और अंतिम क्षणों के लिये तैयार थे, जिसमें बस अब कुछ ही देर थी ।
गजानन बाबा के हाथ से फ़ेंका गया पत्थर सनसनाता हुआ एक बिल्लोरी जानवर की ओर लपका । बस इसी का डायन को इंतजार था । पत्थर लगते ही जानवर मानो अपमान से तिलमिलाया । उसने बैचेनी से अपने शरीर को इधर उधर घुमाया । ठीक उसी क्षण चंडूलिका ने अपनी उंगली जानवर की ओर सीधी कर दी । वह पारदर्शी आकृति वाला जानवर सशरीर हरीश के जिस्म में समाकर एकाकार हो गया ।
हरीश एकदम से लङखङाया, और फ़िर झटके से सीधा हुआ ।
अब उसकी आँखों में वही बिल्लोरी जानवर जैसी तेज चमक नजर आ रही थी ।
गजानन बाबा के छक्के छूट गये ।
वह वापस ‘बचाओ बचाओ’ चिल्लाता हुआ मंदिर की तरफ़ भागा ।
- अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः, अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व । चंडूलिका की गम्भीर महीन आवाज गूँजी - यह देह तो मरणशील है, लेकिन इस शरीर में बैठने वाला आत्मा अमर है । इस आत्मा का न तो अन्त है, और न ही इसका दूसरा कोई मेल है । इसलिये मौत से मत भाग गजानन, और उससे युद्ध कर । मौत से भागकर, तू कहाँ जायेगा, मौत तेरे सिर पर नाच रही है । तेरा अन्त आ गया है ।
तभी यकायक दूसरा बिल्लोरी जानवर उछल कर लपका ।
और दूसरे ही क्षण वह गजानन बाबा के शरीर में समा गया ।
बाबा ने भागना बन्द कर दिया, और सधे सख्त कदमों से पलट कर हरीश की ओर बढ़ा ।
- भाग..हरीश.. ! अचानक सचेत होकर नीलेश चिल्लाया - भाग, जितना तेज भाग सके, यहाँ से दूर भाग ।
मगर हरीश ने जैसे सुना तक नहीं, और वह किसी मल्ल योद्धा की भांति गजानन बाबा से भिङ गया, और दोनों एक दूसरे का गला दबाने लगे । यहाँ तक कि दोनों की जीभें बाहर निकल आयीं । मगर गले पर उनकी पकङ कम नहीं हुयी ।
तभी नीलेश को डायन की आवाज फ़िर सुनाई दी - अँधेरा, कायम रहेगा ।


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डायन The Witch 9




उसे याद आया हिमालयी क्षेत्र में स्वर्ग सीढ़ी के नजदीक भी ऐसा ही स्थान है । जहाँ पूर्वजन्म के संस्कारों से एकत्र हुये लोग स्वतः प्रेरित होकर एक दूसरे का गला दबाने लगते हैं । वास्तव में मौत के इस ओटोमैटिक सिस्टम के चलते वे दोनों शिकार खुद ही एक जगह पर आ गये, और मौत का खेल शुरू हो गया  
- योगी चंडूलिका बोली अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः । जिनके लिये शोक नहीं करना चाहिये, उनके लिये तुम शोक कर रहे हो । और बोल तुम बुद्धिमानों की तरह रहे हो । ज्ञानी लोग, न उनके लिये शोक करते हैं, जो चले गये,  और न ही उनके लिये, जो हैं ।
और अब अंतिम खेल शुरू हो चुका था ।
डायन ने उसे ‘डन’ का अंगूठा दिखाया ।
मगर उसकी तरफ़ से एकदम बेपरवाह नीलेश ने खुद को एकाग्र किया, और बुदबुदाया - अलख..
इसके साथ ही वह अपनी मध्य उंगली को अंगूठे से इस तरह से बारबार छिटकने लगा ।
मानो उसमें कोई गन्दी चीज लगी हो ।
तुरन्त ही वह बिल्लोरी जानवर इस शक्तिशाली प्रयोग से भयभीत हुआ, और हरीश के शरीर से निकलकर डायन में समा गया ।
डायन गुस्से में भयंकर रूप से दहाङी ।
- भाग हरीश ! अबकी बार नीलेश गला फ़ाङकर चिल्लाया मौत से बचना चाहता है, तो भाग । जितना तेज भाग सकता है, उतना तेज भाग, और मंदिर भी मत जाना, यहाँ से दूर भाग जा । सुबह ही मंदिर लौटना, तब मैं देखूँगा ।
हरीश के ऊपर से यकायक मानो नशा सा उतरा ।
उसने बिलकुल भी बिलम्ब नहीं किया, और तेजी से भागने लगा ।
नीलेश के शब्द उसका पीछा कर रहे थे - भाग हरीश, जल्दी भाग, और जल्दी, मौत तेरे पीछे है ।
गजानन बाबा जमीन पर गिर पङा, और निचेष्ट हो गया ।
चारों दूत उसके करीब आ गये, और उसके प्राणों को समेट कर बाहर लाने लगे ।
प्राणीनामा संयुक्त होते ही बाबा का शरीर दो बार हल्के से हिला, और दम निकलते ही वह बेदम हो गया । दूतों ने चंडूलिका को प्रणाम किया, और बाबा के जीव को लेकर हवा में दो सौ फ़ुट ऊँचा उठे । इसके बाद एक उज्जवल चमक सी कुछ क्षणों के लिये नजर आयी, और फ़िर वे उत्तर दिशा में रवाना हो गये ।
कसमसाती हुयी चंडूलिका ने नीलेश को गुस्से से घूरा, और फ़िर अंगूठा दिखाती हुयी बोली - छोङूँगी नहीं ..
- शक्ति ! नीलेश ने हँसकर उसकी तरफ़ देखा ।
डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली अँधेरा ।
और फ़िर वह अदृश्य हो गयी ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी, और टहलता हुआ सा मंदिर की तरफ़ जाने लगा ।


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डायन The Witch 10



दूसरे दिन सुबह नीलेश उन लोगों के उठने से पहले ही गायब था ।
दरअसल वह वनखण्डी मंदिर पर रात में गया ही नहीं था । 
अचानक कुछ ध्यान में आते ही वह उस दिशा में बढ़ने लगा था । जिधर हरीश भागा था ।
वह बेहद सावधानी से उसे तलाशता हुआ जा रहा था । पर उसे हरीश कहीं नजर नहीं आया । तब  उसकी तलाश छोङकर वह वनखण्डी मंदिर से पाँच किमी दूर एक अन्य मंदिर में जा पहुँचा ।
उस समय रात के चार बजने में कुछ ही मिनट कम थे ।
मंदिर का पुजारी और एक बाई गहरी नींद में सोये हुये थे । नीलेश की आहट से बूढ़ा पुजारी स्वयँ ही उठ गया । वह नीलेश को अच्छे योगी और उच्च खानदान के सपूत के तौर पर बखूबी जानता था । उसे नीलेश को इस समय अचानक देखकर कुछ आश्चर्य सा हुआ ।
नीलेश ने उसे बताया कि वह सुबह टहलते हुये इस तरफ़ चला आया, और पुजारी द्वारा खाली किये दीवान पर लेटते हुये उसने आँखें मूँद ली ।
मौत का यूँ साक्षात खेल उसके जीवन में पहली बार घटा था ।
कोई एक घन्टा बाद जब पुजारी ने हाथ में चाय लिये उसे झकझोरते हुये जगाया । तब वह गहरी नींद के आगोश में जा चुका था । तुलसी के पत्तों और तेज अदरक की साधुई चाय ने उसके सुस्त बदन में एक नयी स्फ़ूर्ति पैदा की, और वह फ़िर से चैतन्य होने लगा ।
कोई सवा पाँच बजे तक नीलेश वहीं मौजूद रहा । इसके बाद मंदिर में खङी एक युवा महन्त की बाइक उठाकर वह पीछे के रास्ते वनखण्डी पहुँचा । इसके बाद सबकी निगाह बचाता हुआ वह एक पेङ के सहारे दो मंजिल पर पहुँचा, और वहाँ से आसानी से तिमंजिला स्थिति अपने कमरे में आ गया ।
अब उसे नीचे का जायजा लेना था ।
उसने खिङकी से उस डैथ ग्राउंड का भी जायजा लिया । जहाँ गजानन बाबा देह मुक्त हुआ था ।
पर अभी वहाँ कोई हलचल नहीं थी ।
उस तरफ़ लोगों का आना जाना नौ दस बजे के लगभग ही शुरू होता था ।
तभी बदरी बाबा चाय लेकर उसके कमरे में आया ।
नीलेश उससे यूँ ही हालचाल लेने के अन्दाज में बात पूछने लगा ।
बदरी बाबा ने बताया कि वे चारो लोग पीताम्बर एण्ड कंपनी अपनी गाङी से जा चुके हैं, और सब ठीक ही है । उसे समझ में नहीं आया कि अचानक नीलेश इस तरह क्यों पूछ रहा है ।
- नहीं, नहीं । नीलेश ने बात संभाली - गजानन बाबा डायन बाधा उपचार के लिये उनके साथ जाने वाले थे । ऐसा पीताम्बर बोल रहा था, वे साथ गये, या नहीं?
बदरी बाबा बेहद उपहासी अंदाज में हँसा, और बोला - गजानन बाबा, चरसी चिलम के नशे में क्या न क्या बोल जाये, खुद उसे पता नहीं । वो भला क्या उपचार करेगा । सुबह मैंने उन लोगों को सब समझा दिया । दूसरे गजानन मुँह अंधेरे से ही खुद गायब है । कहीं दिशा मैदान (शौच) को लम्बा निकल गया होगा ।
दूसरे वो पीताम्बर का छोरा हरीश जाने को व्याकुल था, इसलिये वो लोग फ़िर चले गये । वे तुमसे भी मिलने आये, पर तुम भी यहाँ नहीं थे । मैंने कह दिया, सुबह हमारी तरह के साधु लोग अक्सर इधर उधर शौच दातुन आदि को निकल जाते हैं । साधुओं की किसी बात का कोई ठिकाना नहीं होता, कब कहाँ हों ।
- और दूसरे साधु? नीलेश ने प्रश्न किया ।
बदरी को एक बार फ़िर आश्चर्य हुआ, पर वह नीलेश का बेहद सम्मान करता था ।
अतः बोला - वे अभी नहीं उठे, लगता है चिलम ज्यादा चढ़ा ली । क्या पता उठने वाले होंगे ।
- बाबाजी ! अचानक नीलेश ने अजीब सा प्रश्न किया - आप कभी जेल गये हो?
- नहीं तो ! बदरी उछल कर बोला - क्या ..क्या.. क्यों, क्यों?
- अगर ! नीलेश बेहद गम्भीरता से बोला - आगे भी नहीं जाना चाहते, तो तुरन्त बिना सवाल किये मेरे साथ चलो ।


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डायन The Witch 11



इसके ठीक तीसरे दिन नीलेश पीताम्बर के शहर पहुँचा ।
दूसरा दिन उसने वनखण्डी मन्दिर पर ही गुजारा था ।
बदरी बाबा के जीवन में उससे जुङी हुयी यह पहली हत्या थी । इसलिये अन्दर ही अन्दर वह बेहद डरा हुआ था । हालांकि नीलेश को एक परसेंट ही किसी बबाल की उम्मीद थी । फ़िर भी वह बदरी का डर समझते हुये रुक गया था ।
गजानन का थैला आदि अन्य सामान उसने दूसरे साधुओं के नोटिस में आने से पहले ही छिपा देने को कह दिया था । इस तरह अपनी समझ से उसने पूरा इंतजाम ही कर दिया था । इसके बाद भी कोई बात होती, तो बदरी के पास उसका फ़ोन नम्बर था, जिससे वह सीधी बात करा सकता था । तब जाकर बदरी को थोङा तसल्ली मिली ।
नीलेश की ऊँची पहुँच भी उसे काफ़ी हिम्मत बँधा रही थी ।
अब वह सीधा डायन के विशाल निवास में मौजूद था ।
एक बार को मुम्बई में अमिताभ बच्चन का निवास तलाशने में दिक्कत आ सकती थी । पर डायन का निवास तलाश करने में उसे कोई दिक्कत नहीं आयी । उसने डायन के बारे में सीधा सीधा न पूछकर पीताम्बर द्वारा बताये ब्यौरे के आधार पर घुमा फ़िराकर पूछा, और आसानी से यहाँ तक बिना किसी रोकटोक के पहुँच गया । उसने पीताम्बर या हरीश से सम्पर्क करने की कोई कोशिश नहीं की ।
उसके साथ जलवा के नाम से प्रसिद्ध उन्नीस साल का बातूनी बोलने की आदत से मजबूर लङका था । जिसे वह इस पूरे खेल की अहमियत समझते हुये वक्त बेवक्त जरूरत की सोचकर ले आया था । जलवा को भुतहा बातों का बङा शौक था । भुतहा स्थानों को देखने का बङा शौक था । भूतों का देखने का बङा शौक था । पर आज तक उसकी भूत देखने की हसरत पूरी नहीं हुयी थी ।
वह नीलेश की इस योगी रूप वास्तविकता से परिचित नहीं था । लेकिन नीलेश से कुछ कुछ अवश्य परिचित था, और उसके अत्यन्त धनाढ़य होने का रौब खाता था ।
नीलेश ने उसे बताया कि रामसे ब्रदर्स और रामगोपाल वर्मा कोई डरावनी फ़िल्म बनाना चाहते हैं । जिसके लिये उन्हें एक हटकर और रियल टायप लोकेशन की तलाश है । उसी को देखने वह जा रहा था । फ़िर ये जानकर कि रामू जी नीलेश के दोस्त हैं । जलवा दंग रह गया । नीलेश के प्रति उसके मन में अतिरिक्त सम्मान बढ़ गया ।
लेकिन हकीकत और ख्यालात में जमीन आसमान का अन्तर होता है ।
यह जलवा को आज ही पता चला था ।
डायनी महल में कदम रखते ही वह जहाँ का तहाँ ठिठक कर खङा हो गया ।
अपने जीवन में इससे अधिक भयानक जगह उसने सपने में भी नहीं देखी थी । सपने में भी नहीं सोची थी । उस विशाल टूटे फ़ूटे मकान में हर तरफ़ बेहद गन्दगी और दुर्गन्ध का साम्राज्य कायम था । जगह जगह मरे हुये पक्षियों के सूखे पिंजर और बेतरतीब पंख बिखरे हुये थे । विभिन्न जीवों के मल और बीट की भरमार थी । सैकङों उल्लूओं के घोंसले टूटी दीवालों के मोखों में मौजूद थे । अन्य तरह की चिङियाओं, गिरगिट, छिपकली, चमगादङ, काकरोच, मेंढक, गिलहरियों आदि की भी भरमार थी । उस निवास की सफ़ाई झाङू आदि भी बहुत वर्षों से नहीं हुयी थी ।
नीलेश वहाँ स्वतः उग आये पेङों की लम्बी घनी पत्तेदार टहनियाँ तोङकर इकठ्ठी करने लगा । एक समान टहनियों को उसने लकङी की छाल उतार कर उसी के रेशों से बाँधकर झाङू का आकार दे दिया । जलवा हैरत से उसकी तरफ़ देख रहा था । पर समझ कुछ भी नहीं पा रहा था ।
- दादा ! वह बङे अजीब स्वर में बोला - यहाँ शूटिंग करेंगे?
- अरे जलवा भाई ! नीलेश उसका हाथ थामता हुआ बोला - यह फ़िल्लम वाले भी खिसके दिमाग के होते हैं । कहाँ शूटिंग करें, क्या पता । बङी जबरदस्त शूटिंग होने वाली है यहाँ, आओ चलते हैं ।
कहकर उसका हाथ थामे वह मकान में प्रवेश कर गया, और यूँ गौर से मकान का एक एक कोना देखने लगा । जैसे गम्भीरता से मकान खरीदने की सोच रहा हो । मकान की दीवालों पर जगह जगह छोटे जीवों और पक्षियों के खून से विचित्र आकृतियाँ बनी हुयी थीं ।
तभी एक कमरे में पहुँच कर दोनों स्वतः ही ठिठक गये ।
इस कमरे में एक अधखायी नोची हुयी सी सङी हालत में बकरिया पङी हुयी थी । जिससे भयंकर सङांध उठ रही थी । जलवा को उबकायी होते होते बची । इसी कमरे में एक तरफ़ पुआल आदि का लत्ते पत्ते बिछाकर बिस्तर बना हुआ था, और खाये हुये पक्षियों की हड्डियाँ चारो ओर फ़ैली हुयी थी ।


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डायन The Witch 12




डायनी महल से आधा किमी पहले ही उसने टैक्सी छोङ दी, ताकि ड्राइवर को उलझन न हो, और कोई नयी बात न बने । और फ़िर वे दोनों आराम से टहलते हुये डायन के निवास की ओर जाने लगे । इतने आराम से कि डायन निवास पहुँचते पहुँचते उन्हें हल्का अंधेरा सा हो गया ।
जलवा को अंधेरे में उस खौफ़नाक घर में जाते समय बेहद डर लग रहा था । बाहर की अपेक्षा घर में अधिक अंधेरा था । फ़िर नीलेश सीधा डायन के कमरे में पहुँचा ।
और सामने लेटी एक बेहद घिनौनी बुढ़िया को देखकर बोला - ताई, राम राम ।
- ..आऽ ! जलवा के मुँह से डरावनी चीख निकल गयी ।
इस अनोखी रूपाकृति को देखकर वह इतना घबराया कि उसकी पेशाब निकलते निकलते बची ।
-------------

- आओ बच्चो ! बुढ़िया बङे प्यार से धीमे धीमे मरी आवाज में बोली - बैठ जाओ, बङे दिनों बाद, इस बरसों से सूनी पङी हवेली में, मेरे अलावा भी कोई आया है । जानते हो क्यों, क्योंकि लोग कहते हैं कि मैं डायन हूँ..। कहते कहते वह सुबकने लगी - क्या तुम लोगों को मैं किसी तरफ़ से भी डायन लगती हूँ ।
- ये बोल ! जलवा ने बेहद घृणा से मन ही मन में कहा - कि किस एंगल से नहीं लगती । तू तो डायन क्या, डायन की अम्मा नानी दादी चाची सब लगती है । 
नीलेश ने उसकी कसमसाहट समझते हुये उसकी हथेली दबायी । और वह बैठता तो कहाँ बैठता, अतः कमरे में बने आलमारी के गन्दे खानों में ही टेक लेता हुआ टिक गया । नीलेश ने बाजार से खरीदी मोटी और बङी मोमबत्ती से एक मोमबत्ती जलाकर वहाँ चिपका दी । मजबूरी में जलवा ने भी वैसा ही किया । लेकिन वह इस कमरे से क्या, इस मकान से क्या, इस शहर से ही चला जाना चाहता था । इतनी घिनौनी बूढ़ी औरत से उसका आज तक पाला नहीं पङा था ।
- बिलकुल नहीं ! नीलेश सामान्य स्वर में बोला - लोगों के देखने में फ़र्क है, निगाह का अन्तर, जिसे कहते हैं । आप तो एकदम संतोषी माँ लगती हो ।
- मेरा नाम मौलश्री है । बुढ़िया कमजोर आवाज में बोली - तुमने कुछ खा पी लिया मेरे बच्चों ।
- क्या खिलायेगी हरामजादी ! जलवा के मन में घिन हुयी - ये सङी बकरिया, या चमगादङ का खून ।
- ताई ! अचानक नीलेश जलवा की व्यग्रता समझता हुआ बोला - वो हरीश अभी है, या तूने उसे मुक्त कर दिया । शायद जो काम तू वहाँ न कर पायी हो, वो यहाँ कर दिया हो, क्योंकि आज दो दिन और हो गये ।
- अभी कहाँ..अभी तो बहुत काम बाकी है रे ! वह कोहनी के बल टिकती हुयी बोली - अभी बहुत काम बाकी है । मुझ बूढ़ी को क्या क्या नहीं करना पङता, क्या क्या नहीं । सत्तर लोगों को ले जाने की डयूटी है मेरी । अब तक छप्पन ही हुये । अभी चौदह और भी बाकी हैं ।
- फ़िर बङा स्लो काम करती है तू । पचासी की तो तू हो ही गयी, और पचासी में सिर्फ़ छप्पन । तेरे ऊपर वाले कुछ टोकते नहीं क्या?
उसने कोई जबाब नहीं दिया, और ब्लाउज में हाथ डालकर बगल खुजाने लगी । उसके बेहद ढीले ब्लाउज के सिर्फ़ दो बटन लगे थे, और इस तरह खुजाने से उसका दुही जा चुकी बकरी के थन के समान एक निचुङा स्तन बाहर आ गया ।
जलवा को इतनी घिन आयी कि अबकी उसने कोई परवाह न करते हुये साइड में थूक दिया ।


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डायन The Witch 13



- देख भाई ! नीलेश बिस्तर की तरफ़ आते जा रहे तिलचट्टे को उंगली से दूर छिटकता हुआ बोला - भुतहा फ़िल्म की लोकेशन, और उसकी बैकग्राउंड का सही अंदाजा, रात को बारह एक बजे पर ही पता चलता है । जब चाँद एकदम सिर पर होगा । यहाँ ये इधर उधर रेंगते जीव और अपने बिलों में घुसे साँप छँछूदर कैसी आवाज करेंगे । चाँदनी रात में यह महल और आसपास का नजारा कैसा होगा । ये सब पहले से कैसे पता चले, और रही बात उस बुढ़िया की, तो अब मुझे क्या पता था कि यहाँ कोई रहता भी होगा । इसलिये कुछ ले दे के उसको भी निपटा देंगे ।
- अच्छा ! जलवा ने ठंडी सांस भरी - फ़िर ठीक है । बस एक बात और बता दो कि शूटिंग तो मैं अभी के अभी ही देख रहा हूँ । फ़िल्म देख पाऊँगा या नहीं? मतलब तब तक जीता तो रहूँगा ।
- डांट वरी जलवा ! मैं हूँ ना ।
नीलेश अच्छी तरह से जानता था कि जलवा के मन में बहुत सी बातें हैं, जिनको वह कह नहीं पा रहा है । पर अगर वह कहता भी, तो नीलेश के पास उसका कोई जबाब नहीं था । वह सोच रहा था कि जलवा गहरी नींद में सो जाये, तो ज्यादा अच्छा हो ।
लगभग दो घन्टे से थोङा पहले ही जलवा के खर्राटे गूंजने लगे । नीलेश ने बेहोशी लाने वाली जङी उसे सुंघाने की सोची । फ़िर कुछ सोचकर हाथ हटा लिया, और कमरे से बाहर निकल आया । उसने नीचे झांककर देखा पर वहाँ सन्नाटा ही था । और रात के अंधेरे में डायनी महल में डरावनी सांय सांय ही गूंज रही थी ।
क्या कर रही होगी डायन इस समय? उसने सोचा ।
- शक्ति! उसके दिमाग में जैसे ही यह विचार आया ।
उसे डायन की आवाज सुनाई दी - अँधेरा, कायम रहेगा ।
ठीक बारह बजे !
एक दीवाल के सहारे पीठ टिकाये खङा नीलेश सिगरेट के कश लगाता हुआ नीचे आंगन में देख रहा था कि तभी उसे मौलश्री बाहर आंगन में नजर आयी । उसकी चाल ढाल और हरकतों से किसी भी तरह से नहीं लगता था कि वह कोई बूढ़ी कमजोर औरत है । बस उसका शरीर और मुँह अवश्य बूढ़ों वाला था ।
उसके हाथ में पानी से भरा एक बङा मटका था । मौलश्री ने अपने सभी कपङे उतार दिये, और आंगन में घूम घूमकर अपने सर पर से पानी गिराती हुयी वह स्नान करने लगी । इसके बाद उसने वही कहीं से लाल रंग के कपङे उठाये, और पहन लिये । फ़िर वह एक दूसरे अन्य कमरे की तरफ़ चली गयी ।
नीलेश तेजी से नीचे उतर आया, और उसी कमरे की तरफ़ बढ़ गया । उस कमरे में कमरे के अन्दर एक और कमरा था, जो लगभग सुरक्षित हालत में था ।
अन्दर वाले कमरे का गेट खुला था । पर नीलेश बाहर ही रुक गया ।
अन्दर कमरे में एक बङा दिया रोशन था । जिसका प्रकाश पूरे कमरे में फ़ैला हुआ था । तांत्रिकी क्रियाओं के सामान से भरा कमरा जैसे अपनी कहानी खुद ही कह रहा था । अन्दर बीच कमरे में मौलश्री एक नग्न पुरुष लाश के ऊपर बैठी हुयी थी । लाश पुरानी थी, और तंत्रक्रिया तथा अन्य लेपों द्वारा सुरक्षित की गयी थी ।
उसके समीप ही कच्चे फ़र्श में गढ्ढा खोदकर हवन कुण्ड सा बनाया गया था । जिसमें उसने आग जलाना शुरू कर दी थी । पास ही एक प्याला टायप मिट्टी के बरतन में कुछ अधमरे घायल से चमगादङ गिरगिट जैसे छोटे जीव थे ।
लाश के ऊपर बैठी मौलश्री को अगर कोई देख लेता, तो उसकी रूह तक कांप जाती । पर नीलेश के लिये ये कई बार के देखे हुये दृश्य थे । अतः वह आराम से खङा हुआ उसके क्रियाकलाप देख रहा था । मगर बिना किसी उत्सुकता और आश्चर्य के ।
कच्चे कुण्ड की अग्नि भङक उठी । मौलश्री ने विभिन्न जङी बूटियों के छोटे छोटे टुकङे उसमें डाल दिये । अग्नि और भी तेज हो गयी । फ़िर इस निरंतर तेज होती अग्नि के साथ ही उसका चेहरा भभकने सा लगा, और उसने प्याले के घायल जीव कुण्ड में झोंक दिये । कमरे में अजीब सी बू वाला धुँआ का गुबार उठता हुआ कमरे की छत में बनी चिमनी से बाहर जाने लगा ।
फ़िर वह तंत्र जगाती हुयी मंत्रोच्चारण आदि भंगिमायें करने लगी ।
अचानक चट चट की आवाज के साथ उसके शरीर में बदलाव होने लगा, और देखते ही देखते वह अत्यन्त खूबसूरत युवती में बदल गयी । उसके स्तनों और अन्य शरीरी अंगों ने मानो तीव्रता से विकास किया, और उनके बंधन स्वतः टूट गये ।
- मैंने कहा था ना । अचानक वह नीलेश के पीछे दृष्टिपात करती हुयी बोली - सिर्फ़ निगाह का फ़र्क है ।
नीलेश ने सहमति में सिर हिलाया, और पीछे मुढ़कर देखा ।
वहाँ हतप्रभ सा जलवा खङा था ।


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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।