रविवार, अक्तूबर 16, 2011

जस्सी दी ग्रेट 5



सम्पूर्ण सृष्टि का आधार ही है, कामवासना ।
अगर ये कामवासना न होती । स्त्री पुरुष के दैहिक आकर्षण और लैंगिक मिलन की एक अजीब सी और सदा अतृप्त रहने वाली प्यास सभी के अन्दर प्रबल न होती तो शायद कभी समाज का निर्माण संभव ही नही था ।
और वास्तव में आदिसृष्टि के समय जब ज्ञान और आत्मभाव की प्रबलता थी । तब उस समय की आत्मायें काम से बिलकुल मोहित नहीं थी और हद के पार उदासीन ही थीं । देवी तुल्य नारियों से भी पुरुष कामभावना के धरातल पर कतई आकर्षित नहीं होते थे । उनके उन्नत गोल स्तन और थिरकते मांसल नितम्बों की मादक लय भी पुरुषों में एक चिनगी काम पैदा नहीं कर पाती थी ।
जबकि नारी की बात कुछ अलग थी । उसका निर्माण ही प्रकृति रूपा हुआ था, और वह पुरुष के अर्धांग से विचार रूप होकर उत्पन्न हुयी थी तथा बारबार उसको आत्मसात करती हुयी आलिंगित भाव से उसमें ही समाये रहना चाहती थी । उसकी सिर्फ़ एकमात्र ख्वाहिश यही थी ।
पर आदिसंतति प्रबल थी और इस प्रकृति भाव के अधीन नहीं थी, अतः वे तप को प्रमुखता देते थे ।
उस माहौल के प्रभाव से देवी नारी भी तब पुरुष के सामीप्य की एक अजीब सी चाह लिये तप में ही तल्लीन हो जाती थी । लेकिन इस तप का सर्वांगीण उद्देश्य पूर्ण चेतन पुरुष को प्राप्त करना ही था ।
कालपुरुष और दुर्लभ सौन्दर्य की स्वामिनी अष्टांगी कन्या जीवों के इस कामविरोधी रवैये से बङे हैरान थे, क्योंकि सृष्टि का मूल काम उन्हें कतई आकर्षित नहीं कर रहा था, और तब उन्होंने एक निर्णय लेते हुये विष के समान इस काम विषय वासना को अति आकर्षण की मीठी चाशनी में लपेट दिया ।
ये हथियार कारगर साबित हुआ और जीव काम मोहित होने लगे । पुरुष को स्त्री हर रूप में आकर्षित करने लगी । उसके अंग अंग में एक प्रबल सम्मोहन और जादुई प्रभाव उत्पन्न हो गया । उसकी काली घटाओं सी लहराती जुल्फ़ें, गुलाबी लालिमा से दमकते कोमल गाल, रस से भरे हुये अधर और विभिन्न आकारों से सुशोभित गोल स्तन मानों पुरुष के लिये खजाने से भरपूर कलश हो गये ।
उसकी हरे पेङ की डाली सी लचकती, किसी मदमस्त नागिन की तरह बलखाती कमर पुरुषों के दिल को हिलाने लगी । उसकी कटावदार गहरी नाभि में एक उन्मादी सौन्दर्य झलकने लगा, और उसकी गोरी गोरी चिकनी जंघायें तपस्वियों के दिल में तूफ़ान उठाने लगी तथा उसके नितम्बों की लचक से संयमी पुरुषों के दिल भी बेकाबू होने लगे ।
महामाया ने एक और भी विचित्र खेल खेला । उसने नारी की वाणी में सुरीली कोयल की कूक सी पैदा कर दी और उसकी वाणी तक में काम को लपेट दिया । उसकी हर क्रिया को उसने कामपूर्ण कर दिया, और इस तरह ये पुरुष जीवभाव में नारी के वशीभूत होता गया, और आज तक हो रहा है ।
और तब सब कुछ ठीक उल्टा ही हो गया । नारी जो वास्तव में पुरुष से उत्पन्न हुयी थी । पुरुष अपने को अब उसी नारी से उत्पन्न मानने लगा, और उसे ही प्रमुख आदिशक्ति मानता हुआ माया के पूर्ण अधीन हो गया ।  
माया और महामाया ।
अच्छे अच्छे देव पुरुषों और योग पुरुषों को भी अपने इशारों पर सदा नचाने वाली महामाया ।
और करमकौर भी उसी महामाया का ही एक अंश थी ।


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2 टिप्‍पणियां:

Admin ने कहा…

aap apni aankho se dekh Ke POST likhte hai swami ji??

Admin ने कहा…

aapke comment ka intzaar

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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।