रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 18


नितिन वाकई हक्का बक्का रह गया ।
क्या प्रथ्वी पर कोई युवती इतनी सुन्दर भी हो सकती है ? अकल्पनीय, अवर्णनीय !
क्या हुआ होगा । जब यौवन के विकास काल में यह लहराती पतंग की तरह उङी होगी । गुलाबी कलियों सी चटकी होगी । अधखिले फ़ूलों सी महकी होगी । गदराये फ़लों जैसी फ़ूली होगी, क्या हुआ होगा ? क्या हुआ होगा, जब इसकी अदाओं ने बिजलियाँ गिरायी होंगी । तिरछी चितवन ने छुरियाँ चलायी होंगी । इसकी चाल से मोरनियाँ घबरायी होंगी । इसके इठलाते बलखाते बलों से नाजुक लतायें भी आभाहीन हुयी होंगी । लगता ही नहीं, ये कोई स्त्री है, ये तो अप्सरा ही है ।
रम्भा, या मेनका, या लोचना, या उर्वशी । जो स्वर्ग से मध्यप्रदेश की धरती पर उतर आयी, फ़िर क्यों न इस पर श्रंगार के गीत लिखे गये । क्यों न इस पर प्रेम कहानियाँ गढ़ी गयीं, क्यों न किसी चित्रकार ने इसे केनवास पर उतारा, क्यों न किसी मूर्तिकार ने इसे शिल्प में ढाला, क्यों क्यों ?
क्योंकि, ये कवित्त के श्रंगार शब्दों, प्रेमकथा के रसमय संवादों, चित्रतूलिका के रंगों और संगेमरमर के मूर्ति शिल्प में समाने वाला सौन्दर्य ही न था । ये उन्मुक्त, रसीला, नशीला, मधुर, तीखा, खट्टा, चटपटा, अनुपम असीम सौन्दर्य था ।
वाकई, वाकई वह जङवत होकर रह गया ।
पहले वह सोच रहा था कि किशोरावस्था के नाजुक रंगीन भाव के कल्पना दौर से ये लङका गुजर रहा है, और इसकी कामवासना ही इसे इसकी भाभी में बेपनाह सौन्दर्य दिखा रही है, पर अब वह खुद के लिये क्या कहता ? क्योंकि पदमा काम से बनी कल्पना नहीं, सौन्दर्य की अनुपम छटा बिखेरती हकीकत थी । एक सम्मोहित कर देने वाली जीती जागती हकीकत, और वो हकीकत अब उसके सामने थी ।
- नितिन जी ! अचानक उसकी बेहद सुरीली और मधुर आवाज पर वह चौंका - कहाँ खो गये आप, चाय लीजिये न ।
- रूप की देवी, रूपमती, रूपसी, रूपवती, हर अंग रंगीली, हर रंग रंगीली, हर संग रंगीली, रूप छटा, रूप आभा, चारों और रूप ही रूप, किन शब्दों का चयन करे वो, खींचता रूप, बाँधता रूप ।
कैसे बच पाये वो । वह खोकर रह गया ।
यकायक..यकायक फिर उसे झटका लगा - कमाल की कहानी लिखी है, इस कहानी के लेखक ने । जतिन.. कहानी जो उसने शुरू की, उसे कोई और कैसे खत्म कर सकता है । ये कहानी है, सौन्दर्य के तिरस्कार की । चाहत के अपमान की, प्यार के निरादर की । जजबातों पर कुठाराघात की । वह कहता है कि मैं माया हूँ, स्त्री माया है, उसका सौन्दर्य बस मायाजाल है । और ये कहानी, बस यही तो है । पर..पर मैं उसको साबित करना चाहती हूँ कि मैं माया नहीं हूँ । मैं अभी यही तो साबित कर रही थी, तेरे द्वारा । पर तू फ़ेल हो गया, और तूने मुझे भी फ़ेल करवा दिया । जतिन फ़िर जीत गया । क्योंकि .. क्योंकि तू .. तू फ़ँस गया ना, मेरे मायाजाल में ।
- मनसा जोगी ! वह मन ही मन सहम कर बोला - रक्षा कर ।
- अब गौर से याद कर कहानी । उसके कानों में फ़िर से भूतकाल बोला - मैंने कहा था कि मैं जतिन से प्यार करती थी । पर वह कहता था कि स्त्री माया है । ये मैंने तुझे कहानी के शुरू में बताया, मध्य में बताया, इशारा किया । फ़िर मैंने तुझ पर जाल फ़ेंका, दाना डाला । और तुझसे अलग हट गयी । फ़िर भी तू खिंचा चला आया, और खुद जाल में फ़ँस गया । मेरा जाल, मायाजाल ।.. जतिन तुम फ़िर जीत गये । मैं फ़िर हार गयी । ये मूर्ख लङका मुझसे प्रभावित न हुआ होता, तो मैं जीत..गयी होती ।
नितिन को फ़िर एक झटका सा लगा ।
अब ठीक यही तो उसके साथ भी हुआ जा रहा है । और उसका भी हाल कुछ वैसा ही हो रहा है ।
शमशान में जलते तंत्रदीप से बनी सामान्य जिज्ञासा से कहानी शुरू तो हो गयी । पर अभी मध्य को भी नहीं पहुँची, और अन्त का तो दूर दूर तक पता नहीं । कमाल की कहानी लिखी है, इस कहानी के लेखक ने ।
उसने अपनी समूची एकाग्रता को केन्द्रित किया, और बङी मुश्किल से उस रूपसी से ध्यान हटाया ।


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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।