रविवार, अप्रैल 01, 2012

कामवासना 8



- कमाल के आदमी हो भाई । मनोज उसे हैरानी से देखता हुआ बोला - क्या करने आते हो इस मनहूस शमशान में, जहाँ कोई मरने के बाद भी आना पसन्द न करे, पर आना उसकी मजबूरी है । क्योंकि आगे जाने के लिये गाङी यहीं से मिलेगी ।
- यही बात । अबकी वह सतर्कता से बोला - मैं आपसे भी पूछ सकता हूँ । क्या करने आते हो इस मनहूस शमशान में, जहाँ कोई मरने के बाद भी आना पसन्द न करे ।
ये चोट मानों सीधी उसके दिल पर लगी ।
वह बैचेन सा हो गया, और कसमसाता हुआ पहलू बदलने लगा ।
- दरअसल मेरी समझ में नहीं आता । आखिर वह सोचता हुआ सा बोला - क्या बताऊँ, और कैसे बताऊँ । मेरे परिवार में मैं, मेरी भाभी, और मेरा भाई हैं । हमने कुछ साल पहले एक नया घर खरीदा है । सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक कुछ अजीब सा घटने लगा, और उसी के लिये मुझे समझ नहीं आता कि मैं किस तरह के शब्दों का प्रयोग करूँ । जो अपनी बात ठीक उसी तरह कह सकूँ, जैसे वह होती है, पर मैं कह नहीं पाता ।
ये दीपक..उसने दीप की तरफ़ इशारा किया - एक प्रेत उपचार जैसा बताया गया है । लेकिन वास्तव में मुझे नहीं पता कि इसका सत्य क्या है ? यहाँ शमशान में, खास इस पीपल के वृक्ष के नीचे कोई दीपक जला देने से भला क्या हो सकता है, मेरी समझ से बाहर है । पर उस तांत्रिक भगत ने आश्वासन यही दिया है कि  इससे हमारे घर का अजीब सा माहौल खत्म हो जायेगा ।
- क्या अजीब सा ? नितिन यूँ ही सामने दूर तक देखता हुआ बोला ।
- कुछ सिगरेट वगैरह है तुम्हारे पास ? अचानक  वह अजीब सी बैचेनी महसूस करता हुआ  बोला ।
उसने आज एक बात अलग की थी । वह अपना स्कूटर ही यहीं ले आया था, और उसी की सीट पर आराम से बैठा था । शायद कोई रात उसे पूरी तरह वहीं बितानी पङ जाये । इस हेतु उसने बैटरी से एक छोटा बल्ब जलाने का खास इंतजाम अपने पास कर रखा था, और सिगरेट के एक्स्ट्रा पैकेट का भी ।
उसने पैकेट मनोज की तरफ बढ़ा दिया ।
अगले कुछ ही मिनटों में जैसे फिर से नशा उस पर हावी होने लगा, और वह अतीत की गहराइयों में डूब गया । जहाँ वह था, और उसकी भाभी थी ।   
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सुबह के ग्यारह बजने वाले थे ।
पदमा काम से फ़ारिग हो चुकी थी । वह अपने पति अनुराग के आफ़िस चले जाने के बाद सारा काम निबटा कर नहाती थी । उतने समय तक मनोज पढ़ता रहता, और उसके घरेलू कार्यों में भी हाथ बँटा देता ।
उसके नहाने के बाद दोनों साथ साथ खाना खाते । दोनों के बीच एक अजीब सा रिश्ता था, अजीब सी सहमति थी, अजीब सा प्यार था, अजीब सी भावना थी ।
जो कामवासना भी थी, और बिलकुल नहीं भी थी ।
पदमा ने बाथरूम में घुसते हुये कनखियों से मनोज को देखा ।
एक चंचल, शोख, रहस्यमय मुस्कान उसके होठों पर तैर उठी ।
उसने बाथरूम का दरवाजा बन्द नहीं किया, और सिर्फ़ हल्का सा पर्दा ही डाल दिया ।
पर्दा, जो मामूली हवा के झोंके से उङने लगता था ।
तभी आंगन में कुर्सी पर बैठकर पढ़ते हुये मनोज का ध्यान अचानक भाभी की मधुर गुनगुनाहट हु हु हूँ हूँ आऽ आऽ पर गया । वह किताब में इस कदर खोया हुआ था कि उसे पता ही नहीं था कि भाभी कहाँ है, और क्या कर रही है ?
तब उसकी दृष्टि ने आवाज का तार पकङा, और उसका दिल धक्क से रह गया ।
उसके शरीर में एक अजीब गर्माहट सी दौङ गयी ।
बाथरूम का पर्दा रह रहकर हवा से उङ जाता ।
पदमा ऊपरी हिस्से से निर्वस्त्र थी । और आँखें बन्द किये अपने ऊपर पानी उङेल रही थी ।
वह मादक स्वर में गुनगुना रही थी -..हु हु हूँ हूँ
नैतिकता, अनैतिकता के मिले जुले से संस्कार, उस किशोर लङके के अंतर्मन को बारबार थप्पङ से मारने लगे ।
नैतिकता बारबार उसका मुँह विपरीत ले जाती, और अनैतिकता का प्रबल वासना संस्कार उसकी निगाह वहीं ले जाता ।


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बहुचर्चित एवं अति लोकप्रिय लेखक राजीव श्रेष्ठ यौगिक साधनाओं में वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है। उनके सभी कथानक कल्पना के बजाय यथार्थ और अनुभव के धरातल पर रचे गये हैं। राजीव श्रेष्ठ पिछले पच्चीस वर्षों में योग, साधना और तन्त्र मन्त्र आदि से सम्बन्धित समस्याओं में हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके हैं।